नौजवान भारत सभा द्वारा जामिया नगर और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के इलाकों में शहीदेआज़म भगतसिंह के जन्म की 108वीं वर्षगाँठ (28 सितम्बर) के अवसर पर एक सप्ताह का पैग़ाम-ए-इंक़लाब मुहिम का आयोजन

‘शहीद भगतसिंह पुस्तकालय’ (मुंबई) का 28 सितम्बर को उद्धाटन

शहीद भगत सिंह के जन्मदिवस के अवसर पर ‘शहीद भगतसिंह पुस्तकालय’ का 28 सितम्बर को उद्धाटन साथियो भारत की आज़ादी के लिए मात्र 24 साल की उम्र में शहीद होने वाले भगतसिंह का 28 सितम्बर को 108वां जन्म दिवस है। उनकी शहादत को 84 वर्ष बीत चुके हैं पर आज भी देश की मेहनतकश जनता के हालात को देखकर कहा जा सकता है कि जिस सपने के लिए उन्‍होंने जान दी थी वह अधूरा है। आज भी देश की 80 फीसदी जनता ग़रीबी का दंश झेल रही है। शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य…

The Hindutva conspiracies of fomenting communal tension in Delhi

Continued attempts of Hindutva fascists of fomenting communal tension in the workers’ colonies of North-West Delhi (Investigation report of Naujawan Bharat Sabha, North-West Delhi) 1.  Introduction In recent months the Hindutva fundamentalist forces are involved in fomenting communal tensions and paving the way for riots in the workers’ colonies of North-West Delhi in a very systematic and conspiratorial manner. There has been a surge in the number of RSS shakhas in the parks and on the vacant land of DDA in this area. At the same time the activities of…

साम्प्रदायिक फ़ासीवादियों द्वारा जनता को बाँटने की साज़िश को नाकाम करो!

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस समय देश में जनता बढ़ती कीमतों, बेकारी और बदहाली से तंगहाल हो, अचानक उसी समय ‘लव जिहाद’, ‘घर वापसी’ और ‘हिन्दू राष्ट्र निर्माण’ का लुकमा क्यों उछाला जाता है जब चुनाव नज़दीक हों तभी अचानक दंगे क्यों होने लगते हैं जब जनता महँगाई और भ्रष्टाचार की मार से बदहाल होती है उसी समय साम्प्रदायिक तनाव क्यों भड़क जाता है क्या यह केवल संयोग है क्या आप आज़ादी के बाद कोई ऐसा दंगा याद कर सकते हैं जिसमें तोगड़िया, ओवैसी, सिंघल या योगी आदित्यनाथ जैसे लोग मारे जाते हैं क्या दंगों में कभी किसी कट्टरपंथी नेता का घर जलता है नहीं! दंगों में हमेशा हमारे और आपके जैसे आम लोग मारे जाते हैं, बेघर और यतीम होते हैं! जी हाँ! हमारे और आपके जैसे लोग जो अपने बच्चों को एक बेहतर ज़िन्दगी देने की जद्दोजहद में खटते रहते हैं! जिनके खाने की प्लेटों से एक-एक करके सब्ज़ी, दाल ग़ायब हो रहे हैं! जिनके नौजवान बेटे और बेटियाँ सड़कों पर बेरोज़गार घूम रहे हैं!

People in North-East Delhi give Befitting Rebuttal to Sangh Parivar’s Malicious Communal Fascist Designs

People of Khajoori thwarted the communal fascist designs of Sangh Parivar and assembled in large numbers at the venue,which the RSS men have been tying to monopolise of late. Hundreds of people, including women and children, were present throughout the programme braving the severe cold. The thought behind the programme was to remember the legacy of people’s unity our revolutionaries have left behind and spread their message among the people so that one doesn’t get swayed by the present fascist communal propaganda of dividing people on religious lines.

भगतसिंह – जयदेव को एक और पत्र

कृपया यदि हो सके तो मुझे एक और किताब भेजने का प्रबन्ध करना, जिसका नाम ‘थ्योरी ऑफ़ हिस्टोरिकल मैटिरियेलिज़्म: बुख़ारिन’ है। (यह पंजाब पब्लिक लाइब्रेरी से मिल जायेगी)। और पुस्तकालयाध्यक्ष से यह मालूम करना कि कुछ किताबें क्या बोर्स्टल जेल में भेजी गयी हैं? उन्हें किताबों की बहुत ज़रूरत है। उन्होंने सुखदेव के भाई जयदेव के हाथों एक सूची भेजी थी, लेकिन उनको अभी तक किताबें नहीं मिलीं। अगर उनके (पुस्तकालय) पास कोई सूची न हो तो कृपया लाला फ़िरोज़चन्द से जानकारी ले लेना और उनकी पसन्द के अनुसार कुछ रोचक किताबें भेज देना।

भगतसिंह – बारदोली सत्याग्रह

यह सत्याग्रह सरकार के साथ संघर्ष के विचार से नहीं आरम्भ किया गया वरन केवल यह शिकायत दूर करने के लिए था। नेताओं ने यह स्वीकार भी किया है। लेकिन समझ में नहीं आता कि एक-एक शिकायत के लिए लड़ने-झगड़ने के बजाय मूल या जड़ का क्यों नहीं इलाज किया जाता? असल में ज़िम्मेदार नेता तो ज़िम्मेदारी से भागते हैं और तुरन्त समझौते पर उतर आते हैं। तो यह बात स्पष्ट है कि इस तरह लाभ हमेशा ताक़तवर को ही होता है। हम समझते हैं कि जब तक नेता युगान्तकारी भावना और उत्साह के साथ ऐसा क्रान्तिकारी संघर्ष नहीं छेड़ेंगे, तब तक आज़ादी-आज़ादी का शोर करना दूर की बात है।

भगतसिंह – अराजकतावाद: तीन

दरअसल जब दमन और शोषण सीमा से अधिक हो जाये, जब शान्तिमय और खुले काम को कुचल दिया जाये, तब कुछ करने वाले हमेशा गुप्त रूप से काम करना शुरू कर देते हैं और दमन देखते ही प्रतिशोध के लिए तैयार हो जाते हैं। यूरोप में जब ग़रीब मज़दूरों का भारी दमन हो रहा था, उनके हर तरह के कार्य को कुचल डाला गया था या कुचला जा रहा था, उस समय रूस के सम्पन्न परिवार से माईकल बैकुनिन को जो रूस के तोपख़ाने में एक बड़े अधिकारी थे, पोलैण्ड के विद्रोह से निबटने के लिए भेजा गया था। वहाँ विद्रोहियों को जिस प्रकार ज़ुल्म करके दबाया जा रहा था, उसे देखकर उनका मन एकदम बदल गया और वे युगान्तकारी बन बैठे। अन्त में उनके विचार अराजकतावाद की ओर झुक गये। उन्होंने सन् 1834 में नौकरी त्याग दी। उसके पश्चात बर्लिन और स्विट्ज़रलैण्ड के रास्ते पेरिस पहुँचे। उस समय आमतौर पर सरकारें इनके विचारों के कारण इनके विरुद्ध थीं। 1864 तक वह अपने विचार पुख़्ता करते रहे और मज़दूरों में प्रचार करते रहे।

भगतसिंह – अराजकतावाद: दो

सम्पत्ति बनाने का विचार मनुष्यों को लालची बना देता है। वह फिर पत्थर-दिल होता चला जाता है। दयालुता और मानवता उसके मन से मिट जाती है। सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए राजसत्ता की आवश्यकता होती है। इससे फिर लालच बढ़ता है और अन्त में परिणाम – पहले साम्राज्यवाद, फिर युद्ध होता है। ख़ून-ख़राबा और अन्य बहुत नुक़सान होता है। अगर सबकुछ संयुक्त हो जाये तो कोई लालच न रहे। मिल-जुलकर सभी काम करने लगें। चोरी, डाके की कोई चिन्ता न रहे। पुलिस, जेल, कचहरी, फ़ौज की ज़रूरत न रहे। और मोटे पेटवाले, हराम की खाने वाले भी काम करें। थोड़ा समय काम करके पैदावार अधिक होने लगे। सभी लोग आराम से पढ़-लिख भी सकें। अपनेआप शान्ति भी रहे, ख़ुशहाली भी बढ़े। अर्थात वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि संसार से अज्ञानता दूर करना बहुत आवश्यक है।

भगतसिंह – अराजकतावाद: एक

अराजकतावाद एक नया दर्शन है जिसके अनुसार एक नया समाज बनेगा। जनता का रहन-सहन या भ्रातृत्व ऐसा होगा जिसमें कि मनुष्य के बनाये नियम कोई अवरोध न पैदा कर सकेंगे। उनके अनुसार किसी भी शासन की ज़रूरत नहीं महसूस होती, क्योंकि प्रत्येक सरकार दमन पर टिकी होती है। इसलिए यह अनावश्यक है।