बचपन के दोस्त जयदेव को भगतसिंह का पत्र

आपका बहुत धन्यवाद होगा अगर आप एक दूसरा जोड़ा कपड़े के जूते श्री दत्त के लिए भेज सको। लेकिन दुकानदार से उन्हें पूरा न आने की स्थिति में वापसी की शर्त से लें। मैं इस बारे में अपने पहले ख़त में ही लिख सकता था, लेकिन उस समय श्री दत्त अच्छे मूड में नहीं थे। मगर मेरे लिए यह बहुत कठिन बात है कि मैं अकेला ही इन जूतों को पहनूँ। मैं उम्मीद करता हूँ कि अगली मुलाक़ात के समय जूतों का एक और जोड़ा यहाँ पड़ा होगा।

भगतसिंह – जयदेव के नाम एक और पत्र

आज फिर तुम्हें कुछ तकलीफ़ देने के लिए मैं यह ख़त लिख रहा हूँ, उम्मीद है कि तुम बुरा नहीं मानोगे। कृपया मेरे लिए पैरों का फ़लीट जूता भेजने का प्रबन्ध करना। 9-10 नम्बर का चल जायेगा। चप्पल से बहुत बेआरामी है। कृपया इन्हें शुक्रवार या शनिवार को कुलबीर के हाथ भेजने की कोशिश करना, जब वह हमारी मुलाक़ात के लिए आयेगा।

भगतसिंह – क्रान्तिकारी साथी जयदेव के नाम पत्र

मुझे उम्मीद है कि तुमने 16 दिन के बाद हमारी भूख हड़ताल छोड़ने की बात सुन ली होगी और तुम अन्दाज़ा लगा सकते हो कि इस समय तुम्हारी मदद की हमें कितनी ज़रूरत है। हमें कल कुछ सन्तरे मिले, लेकिन कोई मुलाक़ात नहीं हुई। हमारा मुक़दमा दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया गया है। इसलिए एक टिन घी और एक ‘क्रेवन-ए’ सिगरेट का टिन भेजने की तुरन्त कृपा करो। कुछ रसगुल्लों के साथ कुछ सन्तरों का भी स्वागत है। सिगरेट के बिना दल की हालत ख़राब है। अब हमारी ज़रूरतों की अनिवार्यता समझ सकते हो।

सुखदेव को भूख हड़ताल के दौरान भगतसिंह का एक और पत्र

आप भली प्रकार जानते हैं कि रूस में राजनीतिक बन्दियों का बन्दीगृहों में विपत्तियाँ सहन करना ही ज़ारशाही का तख़्ता उलटने के पश्चात उनके द्वारा जेलों के प्रबन्ध में क्रान्ति लाये जाने का सबसे बड़ा कारण था। क्या भारत को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं है, जो इस विषय से पूर्णतया परिचित हों और इस समस्या का निजी अनुभव रखते हों। केवल यह कह देना कि दूसरा कोई इस काम को कर लेगा या इस कार्य को करने के लिए बहुत लोग हैं, किसी प्रकार भी उचित नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार जो लोग क्रान्तिकारी क्षेत्र के कार्यों का भार दूसरे लोगों पर छोड़ने को अप्रतिष्ठापूर्ण एवं घृणित समझते हैं, उन्हें पूरी लगन के साथ वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर देना चाहिए।

पिता के नाम भगतसिंह का पत्र

वकील आदि की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है। हाँ, एक-दो नुक्तों पर थोड़ा-सा मशवरा लेना चाहता हूँ, लेकिन वे कोई ख़ास महत्त्व नहीं रखते। आप बिना वजह ज़्यादा कष्ट न करें। अगर आप मिलने आयें तो अकेले ही आना। बेबे जी (माँ) को साथ न लाना। ख़ामख़ाह में वे रो पड़ेंगी और मुझे भी कुछ तकलीफ़ ज़रूर होगी।

सुखदेव के नाम भगतसिह का पत्र

सुखदेव के नाम भगतसिह का पत्र मार्च, 1929 में पब्लिक सेफ्टी बिल को असेम्बली में भारतीय सदस्यों द्वारा रद्द करने पर दोबारा लाया गया। यद्यपि बिल मतगणना से पास नहीं हो सकता था, तो भी वायसराय उसे आर्डिनेंस द्वारा लागू करना चाहते थे। राष्ट्रीय नेता एक बार फिर ब्रिटिश सरकार की ताक़त के सामने लाचारी और अप्रभावी होने की स्थिति पेश कर रहे थे। ऐसे समय पर भगतसिह ने सुझाव दिया कि असेम्बली हॉल में बम का धमाका किया जाये और क्रान्तिकारी पार्टी के विचारों से जनता को शिक्षित किया जाये।…

मित्र अमरचन्द को लिखा भगतसिंह का पत्र

मेरा हाल भी ख़ूब है। बारहा (कई बार) मुसायब (मुसीबतों) का शिकार होना पड़ा। आख़िर केस वापस ले लिया गया। बादवाँ (बाद में) फिर गिरफ्तार हुआ। साठ हज़ार की जमानत पर रिहा हूँ। अभी तक कोई मुक़दमा मेरे ख़िलाफ़ तैयार नहीं हो सका

गाँधीजी के नाम सुखदेव की खुली चिट्ठी

आपके समझौते के बाद आपने अपना आन्दोलन बन्द किया है, और फलस्वरूप आपके सब क़ैदी रिहा हुए हैं। पर क्रान्तिकारी क़ैदियों का क्या? 1915 ई. से जेलों में पड़े हुए ग़दर-पक्ष के बीसों क़ैदी सज़ा की मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़ रहे हैं। मार्शल लॉ के बीसों क़ैदी आज भी ज़िन्दा क़ब्रों में दफ़नाये पड़े हैं। यही हाल बब्बर अकाली क़ैदियों का है।

भगतसिंह – राजनीतिक मामलों की पैरवी पर

ऐसे केसों में हमें अपने द्वारा प्रचारित विचारों और आदर्शों को स्वीकार कर लेना चाहिए और स्वतन्त्र भाषण का अधिकार माँगना चाहिए, परन्तु कहाँ यह बात और कहाँ यह कहना कि हमने कुछ कहा ही नहीं! हम इस तरह अपने ही आन्दोलन के हितों के विरुद्ध जाते हैं। कांग्रेस को मौजूदा आन्दोलन में बिना मुक़दमों की पैरवी किये जेल जाने से नुक़सान पहुँचा है। मेरे विचार में यह एक ग़लती थी।

भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त – विशेष ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन पर

अदालत में क्रान्तिकारियों, ख़ासकर भगतसिंह को संवाददाताओं और जनता के सामने लाठियों और जूतों से मारा गया। भगतसिंह ने भारतीयों को गाली देने पर आपत्ति करते हुए जस्टिस आग़ा हैदर के भारतीय होने पर सवाल किया और पूछा कि ऐसी मानसिक स्थिति वाले जज न्याय कैसे करेंगे? जस्टिस आग़ा हैदर ने उस दिन की कार्रवाई पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। इस घटना की दुनियाभर में चर्चा हुई। सारे भारत में भगतसिंह-दिवस मनाया गया, जिसके फलस्वरूप जस्टिस कोल्डस्ट्रीम को लम्बी छुट्टी पर जाना पड़ा और 21 जून को ट्रिब्यूनल नये सिरे से गठित किया गया। अब जस्टिस जी.सी. हिल्टन को अध्यक्ष व जस्टिस जे.के. टैप और जस्टिस अब्दुल कादिर को सदस्य बनाया गया।