दिल्ली विधानसभा चुनाव की महानौटंकी पूरे ज़ोरों पर है। भाजपा, कांग्रेस से लेकर ‘आप’ में “तू नंगा-तू नंगा” का खेल शुरू हो गया है। लेकिन सभी जानते हैं कि इस चुनावी हम्माम में सभी नंगे हैं! भाजपा दिल्ली के लोगों से हवा-हवाई वायदे करते हुए अभी भी मोदी का “अच्छे दिन” का बासी पड़ चुका गाना गा रही है। ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) अपनी सरकार के 49 दिनों के बारे में झूठा प्रचार करते हुए पाँच साल बने रहने की कसम खा रही है। कांग्रेस इस चूहा-दौड़ में अपने आपको सबसे पीछे पाकर सबसे ज़्यादा झूठे वायदे करने में लग गयी है। ऐसे में हमें फिर से चुनने के लिए कहा जा रहा है। चुनावी पार्टियों के इन हवाई दावों के बीच जब आज महँगाई आसमान छू रही है, थाली से दाल-सब्ज़ी गायब हो रही है; शिक्षा, चिकित्सा, रिहायश आम मेहनतकश आदमी की पहुँच से बाहर होता जा रहा है तो सवाल यह उठता है कि क्या हमारे पास चुनावों में वाकई कोई विकल्प है?
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अहमदनगर में बर्बर दलित-विरोधी अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाओ!
अहमदनगर में 21 अक्टूबर को एक दलित परिवार के तीन लोगों की बेरहमी से हत्या और उसके बाद में उनके टुकड़े–टुकड़े करके कुएँ में फ़ेंक दिये जाने के काण्ड ने एक बार फिर महाराष्ट्र की मेहनतकश आबादी को झकझोर कर रख दिया है। तमाम दलितवादी चुनावी पार्टियाँ अपने संकीर्ण हितों के लिए इस घटना को भी एक “सुनहरे अवसर” के तौर पर देख रही हैं और दलितों के हित के नाम पर इसका पूरा फायदा उठाने की कवायद में लग गयी हैं। वहीं पूँजीवादी मीडिया हर बार की तरह इस बार भी या तो इस घटना पर पर्दा डालने का काम कर रहा है या फिर इस घटना को महज़ दो परिवारों के बीच आपसी रंजिश का नाम देकर दलितों पर हो रहे अत्याचारों को ढँकने का प्रयास कर रहा है। लेकिन मेहनतकश दलित आबादी जानती है कि चाहे मसला कुछ भी हो हर विवाद में अन्त में दलितों को ही इन बर्बर अत्याचारों का शिकार होना पड़ता है। ऐसा क्यों होता है कि हमेशा ग़रीब दलितों को ही इन बर्बर काण्डों का निशाना बनाया जाता है? हमेशा सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर आबादी को ही ये ज़ुल्म क्यों सहने पड़ते हैं?
युवा और संवेदनशील डॉक्टरों के नाम
हमारी यह अपील उन युवा दिलों से है जो अभी घाघ और दुनियादार नहीं बने हैं। जो बेरहम-धनलोलुपों की जमात में दिल से शामिल नहीं हुए हैं। जिनके अन्दर मनुष्यता बची है और जो अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए तैयार हैं। यदि आप सोचते हैं कि इस दिशा में सार्थक सामूहिक कोशिश की जानी चाहिए तो हमसे ज़रूर सम्पर्क कीजिये।
To the Young and Sensitive Doctors
This appeal is addressed to all the young hearts who have not become shrewd and worldly wise. Who have not joined the ranks of cruel moneybags. Who still have humanity in their hearts and are ready to raise their voice against injustice. If you think a meaningful collective effort must be made in this direction, do not hesitate to contact us.
हरियाणा में हो रहे दलित और स्त्री उत्पीड़न के खि़लाफ़ आवाज़ उठाओ!
हम देश के उन बहादुर, इंसाफ़पसन्द युवाओं और नागरिकों से मुख़ातिब हैं जो कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में रीढ़विहीन केंचुए नहीं बने हैं, जिन्होंने अपने ज़मीर का सौदा नहीं किया है; जो न्याय के पक्ष में खड़े होने का माद्दा रखते हैं। साथियो! हमें उठना ही होगा और तमाम तरह के दलित और स्त्री उत्पीड़न का पुरजोर विरोध करना होगा। सड़ी और मध्ययुगीन सोच को उसकी सही जगह इतिहास के कूड़ेदान में पहुँचा देना होगा।
भगवा फासीवादियों का झूठी अफवाहें फैलाकर अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित हमला।
23 अप्रैल,2014 को सोनिया विहार (दिल्ली-गाजियाबाद सीमा) में गाय काटने की झूठी अफ़वाह के बाद भगवा गिरोह ने मुस्लिम आबादी की दुकानों व वाहनों में आग लगा दी और उनसे बदसलूकी की। इस घटना में कोई हताहत तो नहीं हुआ लेकिन आगजनी से लाखों का नुकसान हो गया। इस घटना के बाद दिल्ली व उत्तर प्रदेश की पुलिस ने अपनी जाँच में पाया कि जिस बात की आड़ लेकर इन दंगाईयों ने यह आगजनी की। उसमें नाममात्र की भी सच्चाई नहीं थी। कई लोगों से बातचीत करने पर यह बात सामने आई की यहाँ से कुछ किलोमीटर दूर यू.पी. के न्यू आनंदविहार इलाके में तीन-चार दिन पहले हुए एक मामूली झगड़े की घटना के बाद – झूठी बात के सहारे एक समुदाय के विरोध में अफवाह फैलाकर इस शर्मनाक घटना को अंजाम दिया गया। दोस्तों पिछले साले हुए मुजफ्फरनगर के दंगों की रिपोर्टों में भी यह बात सामने आयी थी कि साम्प्रदायिक ताक़तों ने नकली वीडियो दिखाकर और अपफवाहें फैलाकर साम्प्रदायिक दंगों की शुरुआत की थी। आज सभी चुनावबाज़ पार्टियों के पास ‘बाँटो और राज करो’ के अलावा चुनाव जीतने का और कोई हथकण्डा नहीं बचा है।
लोकसभा चुनाव-2014 – हाँ, हमें चुनना तो है! लेकिन किन विकल्पों के बीच?
16वें लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। हमें फिर चुनने के लिए कहा जा रहा है। लेकिन चुनने के लिये क्या है? झूठे आश्वासनों और गाली-गलौच की गन्दी धूल के नीचे असली मुद्दे दब चुके हैं। दुनिया के सबसे अधिक कुपोषितों, अशिक्षितों व बेरोज़गारों के देश भारत के 66 साल के इतिहास में सबसे महँगे और दुनिया के दूसरे सबसे महँगे चुनाव (30 हज़ार करोड़) में कुपोषण, बेरोज़गारी या भुखमरी मुद्दा नहीं है! बल्कि “भारत निर्माण” और देश के “विकास” के लिए चुनाव करने की दुहाई दी जा रही है! विश्व पूँजीवादी व्यवस्था गहराते आर्थिक संकट तले कराह रही है और इसका असर भारत के टाटा, बिड़ला, अम्बानी-सरीखे पूँजीपतियों पर भी दिख रहा है। ऐसे में, भारत का पूँजीपति वर्ग भी चुनाव में अपनी सेवा करने वाली चुनावबाज़ पार्टियों के बीच चुन रहा है। पूँजीवादी जनतंत्र वास्तव में एक धनतंत्र होता है, यह शायद ही इससे पहले किसी चुनाव इतने नंगे रूप में दिखा हो। सड़कों पर पोस्टरों, गली-नुक्कड़ों में नाम चमकाने वाले पर्चों और तमाम शोर-शराबे के साथ जमकर दलबदली, घूसखोरी, मीडिया की ख़रीदारी इस बार के चुनाव में सारे रिकार्ड तोड़ रही है। जहाँ भाजपा-कांग्रेस व तमाम क्षेत्रीय दल सिनेमा के भाँड-भड़क्कों से लेकर हत्यारों-बलात्कारियों-तस्करों-डकैतों के सत्कार समारोह आयोजित करा रहे हैं, तो वहीं आम आदमी पार्टी के एनजीओ-बाज़ “नयी आज़ादी”, “पूर्ण स्वराज” जैसे भ्रामक नारों की आड़ में पूँजीपतियों की चोर-दरवाज़े से सेवा करने की तैयारी कर रही है; भाकपा-माकपा-भाकपा(माले) जैसे संसदीय वामपंथी तोते हमेशा की तरह ‘लाल’ मिर्च खाकर संसदीय विरोध की नौटंकी के नये राउण्ड की तैयारी कर रहे हैं। उदित राज व रामदास आठवले जैसे स्वयंभू दलित मसीहा सर्वाधिक सवर्णवादी पार्टी भाजपा की गोद में बैठ कर मेहनतकश दलितों के साथ ग़द्दारी कर रहे हैं। ऐसे में प्रश्न यह खड़ा होता है कि हमारे पास चुनने के लिए क्या है?
शहीद भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू के 84 वें शहादत दिवस (23 मार्च,2014) के अवसर पर
क्या यह सोचकर आपके दिल में तड़प नहीं पैदा होती कि भगतसिंह और उनके नौजवान साथियों की कुरबानी के 84 बरस बीत जाने के बाद भी आज हम पूँजीवादी लूट-खसोट, गैर-बराबरी, शोषण-दमन, अत्याचार और भ्रष्टाचार से भरे वैसे ही समाज में घुट-घुट कर जी रहे हैं जिसे मिटाने के लिए उन जैसे असंख्य नौजवान शहीद हुए थे? क्या आपको नहीं लगता कि यूँ गुलामों की तरह जीना तो मौत से भी बदतर है? क्या ये बेहतर नहीं कि हार और गुलामी को अपनी किस्मत मानने के बजाय शहीदे-आजम भगतसिंह के नारे को फिर से दोहराये कि ‘‘अन्याय के खिलाफ विद्रोह न्यायसंगत है, विद्रोह करो और विद्रोह से क्रान्ति की ओर आगे बढ़ो!’’