भगतसिंह के 110वें जन्मदिवस (28 सितम्बर) पर
शहीदों के सपनों को पूरा करने के लिए उठ खड़े हो!
आपस में बँटो नहीं, एकजुट हो, हक के लिए मिलकर लड़ो!!
साथियो, शहीदेआज़म भगतसिंह का जन्मदिवस हम एक ऐसे समय में मनाने जा रहे हैं जब इस व्यवस्था का बर्बर, हत्यारा, शोषक चरित्र एकदम नंगा हो चुका है। लोगों के बुनियादी हकों पर रोज़ डकैती डाली जा रही है। सत्ता के चहेते चन्द पूँजीपतियों के मुनाफ़े के लिए सारे देश को खुली लूट का चरागाह बना दिया है। जो भी इस अँधेरगर्दी के विरुद्ध आवाज़ उठाता है उसे “देशद्रोही” करार दिया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे गोरों के राज में भगतसिंह और उनके साथियों को “देशद्रोही” कहा जाता था! भगतसिंह ने यूँ ही नहीं कहा था कि गोरे अंग्रेज़ों की जगह काले अंग्रेज़ों के गद्दी पर सवार हो जाने का मतलब आज़ादी नहीं होगा। 23 मार्च 1931 को अपनी शहादत से कुछ दिन पहले उन्होंने चेतावनी दी थी, “अंग्रेज़ों की जड़ें हिल गयी हैं और 15 साल में वे यहाँ से चले जायेंगे। बाद में काफ़ी अफ़रा-तफ़री होगी और तब लोगों को मेरी याद आयेगी।”
आज छात्र-युवा-मज़दूर-किसान-कर्मचारी-सैनिक-दलित-अल्पसंख्यक-स्त्री कोई भी अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाता है तो उसकी लड़ाई को बूटों तले रौंद दिया जाता है। छेड़खानी और लम्पटई के विरोध में आन्दोलन करने वाली बी.एच.यू. की छात्राओं पर बर्बर लाठीचार्ज इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में मासूमों की मौत और उनके परिजनों की चीखें आज भी कानों में गूँज रही हैं। महँगाई-बेरोज़गारी दूर करने का जुमला अब एक अश्लील चुटकुला बन चुका है। गैस सिलिण्डर, पेट्रोल-डीज़ल और खाने-पीने की चीज़ों से लेकर दवा-इलाज, शिक्षा हर चीज़ की कीमतों में आग लगी हुई है। छात्र-नौजवान बेरोज़गारी में धक्के खा रहे हैं जबकि सरकारी नौकरियाँ लगातार कम की जा रही हैं। प्राइवेट सेक्टर में बड़ी-बड़ी कम्पनियों द्वारा लाखों लोगों की छँटनी तो अख़बारों की सुर्खियों में आ चुकी है लेकिन छोटी कम्पनियों और कारख़ानों में काम करने वालों के रोज़गार छिनने की संख्या इससे बहुत ज़्यादा है। कुछ लोगों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए जनता पर थोपी गयी नोटबन्दी और फिर जी.एस.टी. की मार ने पहले से खस्ताहाल अर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी है। बचे हुए सार्वजनिक उपक्रम भी निजी हाथों में बेचे जा रहे हैं और कर्मचारियों को मिलने वाले अधिकारों में निरन्तर कटौती जारी है। देश के जल-जंगल-ज़मीन को देशी-विदेशी लुटेरों की अन्धी लूट-खसोट के हवाले करने की पिछली सरकारों की नीतियों को और भी परवान चढ़ाया जा रहा है। भ्रष्टाचार, अपराध, गन्दगी किसी चीज़ में कोई कमी नहीं आयी है। इस सबके बाद भी प्रधानमंत्री गरीबों की ज़िन्दगी बदलने, देश के विकास आदि के झूठे बयान दिये जा रहे हैं और बिकाऊ मीडिया बेशर्मी से सरकार का गुणगान करने में जुटा हुआ है। करोड़ों रुपये खर्च करके हज़ारों लोगों को व्हाट्सऐप, फ़ेसबुक आदि पर सरकार की तारीफ़ और उसके विरोधियों को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के झूठों का प्रचार करने के वास्ते नौकरी पर रखा गया है।
इस लूट और अँधेरगर्दी के ख़िलाफ़ लोग संगठित न हो सकें इसलिए कट्टरपंथ, साम्प्रदायिकता और अन्धराष्ट्रवाद आदि का ज़हर लोगों के दिमाग में भरा जा रहा है। तर्क, प्रगतिशील विचारों व मानवता को आगे ले जाने वाले मूल्यों पर संगठित हमले जारी हैं। दूसरी ओर हर अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने वाले नौजवानों की एक बड़ी आबादी इस समय निराशा, कुण्ठा और भ्रम की शिकार है। बेहतर भविष्य के लिए उड़ान भरने वाले उनके पंख कीचड़ में लिथड़े हुए हैं। ऐसे वक़्त में भगतसिंह के शब्दों में ‘क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा करने की ज़रूरत है ताकि इंसानियत की रूह में हरकत पैदा हो’ इसीलिए हम शहीदेआज़म भगतसिंह के जन्मदिवस पर उनके सपनों को याद कर रहे हैं और उन्हें पूरा करने के लिए नौजवानों का आह्वान कर रहे हैं।
क्या था भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू का सपना?
भगतसिंह का सपना केवल अंग्रेजों को देश से भगाना नहीं था। बल्कि उनका सपना हज़ारों साल से चली आ रही अमीरी व गरीबी की व्यवस्था को इतिहास के कूड़ेदान में फेंककर समता और न्याय पर आधारित समाज बनाकर एक नये युग का सूत्रपात करना था। 1930 में ही भगतसिंह ने कहा था कि हम एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान व एक देश द्वारा दूसरे देश के शोषण के खि़लाफ़ हैं। कांग्रेस व गाँधी के वर्ग-चरित्र और धनिकों व भूस्वामियों पर उनकी निर्भरता को देखते हुए भगतसिंह ने चेतावनी दी थी कि इनका मक़सद लूटने की ताक़त गोरों के हाथ से लेकर मुट्ठीभर भारतीय लुटेरों के हाथ में सौंपना है। इसीलिए इनकी लड़ाई का अन्त किसी न किसी समझौते के रूप में होगा। भगतसिंह ने 6 जून 1929 को अदालत में अपने ऐतिहासिक बयान में कहा था कि – “क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है मुट्ठीभर परजीवी जमातों द्वारा आम जनता की मेहनत की लूट पर आधारित, अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन। समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं। दुनिया भर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढँकने भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।”
भगतसिंह और उनके साथी ऐसा समाज बनाना चाहते थे जिसमें जाति और धर्म के नाम पर झगड़े न हों। भगतसिंह ने जब देश के युवाओं को संगठित करने के लिए ‘नौजवान भारत सभा’ का गठन किया तो इस बात का विशेष ख़्याल रखा। भगतसिंह का संगठन शुरू से ही धर्मनिरपेक्ष संगठन था। अंग्रेज़ जहाँ एक ओर आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर करने के लिए हिन्दू व मुसलमानों को आपस में लड़ा रहे थे वहीं हिन्दू महासभा और तबलीग़ी जमात जैसे कट्टरपंथी संगठन भी हिन्दू-मुस्लिम के झगड़े पैदा करके अंग्रेजों की प्रकारान्तर से मदद कर रहे थे। भगतसिंह जैसे क्रान्तिकारियों के विचारों को भारत के शासक वर्ग ने न केवल धूल व राख के नीचे दबाने की घृणित साज़िश रची, बल्कि उन्हें केवल बन्दूक-पिस्तौल वाले नौजवान के रूप में जनता में स्थापित कर दिया है। जबकि अपने आरम्भिक क्रान्तिकारी दिनों को छोड़कर भगतसिंह जनता को जगाने व उनके व्यापक संगठित ताकत के जरिये ही क्रान्ति करने के प्रबल समर्थक थे। जेल से भेजे गये विद्यार्थियों के नाम पत्र में उन्होंने लिखा – “इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठायें। आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी महत्वपूर्ण काम हैं। नौजवानों को क्रान्ति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है, फैक्ट्री-कारखानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रान्ति की अलख जगानी है जिससे आज़ादी आयेगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।” भगतसिंह ने देशी-विदेशी लूट को ख़त्म करना अपना लक्ष्य बताया था।
यह कैसी आज़ादी है यह किसकी आज़ादी है, जनता के हिस्से में केवल लूट और बर्बादी है
आज़ादी के इतने सालों में शासक वर्गों द्वारा जनता को धीरे-धीरे नर्ककुण्ड में धकेल दिया गया है। “विकास” की सच्चाई यह है कि देश की ऊपर की 1 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल सम्पदा का 58.4 प्रतिशत हिस्सा इकट्ठा हो चुका है और अगर ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी को लें तो यह आँकड़ा 80.7 प्रतिशत तक पहुँच जाता है। दूसरी ओर नीचे की 50 प्रतिशत आबादी के पास कुल सम्पदा का महज 1 प्रतिशत है। देश के गोदामों में अनाज सड़ने के बावजूद प्रतिदिन लगभग 9000 बच्चे कुपोषण व स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से मर जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक कुपोषण का शिकार दुनिया का हर तीसरा बच्चा भारत का है। देश के लगभग 30 करोड़ लोग बेरोज़गारी में धक्के खा रहे हैं। जनता की सुविधाओं में लगातार कटौती की जा रही है और अमीरों के अरबों रुपये के कर्ज़ माफ़ किये जा रहे हैं।
फ़ासीवाद का उभार
पूँजीपतियों द्वारा पैदा किये गये आर्थिक संकट के कारण जब उनके मुनाफ़े में कमी आने लगती है तो वे ऐसी फ़ासिस्ट ताक़तों को मज़बूत करते हैं जो जनता को बुरी तरह से चूसने में उनकी मदद करें। जनता के असन्तोष को कुचलने के लिए फ़ासिस्ट बहुत सारे हथकण्डे अपनाते हैं। वे पूँजीवादी लूट को छिपाने के लिए “विकास” का ढिंढोरा पीटने, “बेहतर दिन लाने” आदि का खूब प्रचार करते हैं, दूसरी ओर जनता के सामने नस्ल, धर्म और “राष्ट्र” आदि के नाम पर एक नकली दुश्मन खड़ा करते हैं। भारत में यही काम संघ परिवार कर रहा है। संघ परिवार किसी न किसी बहाने मुसलमानों को हिन्दुओं के दुश्मन के रूप में पेश करता है। संघ परिवार के राजनीतिक संगठन भाजपा की सरकार एक ओर अमीरों के फ़ायदे के लिए जनता को मिलने वाली सुविधाओं में लगातार कटौती कर रही है, दूसरी ओर तमाम तरह के झूठे मुद्दे उछाले जा रहे हैं ताकि लोग आपस में ही लड़ते रहें और उनकी लूट पर कोई आँच न आये। नौजवानों को इसके खि़लाफ़ उठना ही होगा नहीं तो देश भयानक तबाही की ओर बढ़ चुका है। जनता को यह बात समझाना ही होगा कि उनकी तबाही-बर्बादी की वजह कोई पराया देश या धर्म नहीं है बल्कि लूट व अन्याय पर टिकी मौजूदा व्यवस्था है।
साथियो, भगतसिंह और उनके साथियों से प्रेरणा लेते हुए हमें उठ खड़ा होना होगा। हम सभी इंसाफ़पसन्द नागरिकों, मेहनतकशों और छात्रें-नौजवानों की ओर अपना हाथ बढ़ा रहे हैं। देश में एक नयी शुरुआत हो चुकी है। भगतसिंह द्वारा बनाये ‘नौजवान भारत सभा’ को फिर से ज़िन्दा कर दिया गया है। देश के कई विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में हम इन्हीं आदर्शों पर क्रान्तिकारी छात्र संगठन बना रहे हैं। मेहनतकशों के बीच भी काम शुरू किया जा चुका है, स्त्रियों व जागरूक नागरिकों के मंच व संगठन जगह-जगह संगठित हो रहे हैं। इस विशाल देश को देखते हुए यह शुरुआत छोटी लग सकती है। लेकिन हर लम्बे सफ़र की शुरुआत एक उठाये गये पहले क़दम से ही होती है। दिशा यदि सही हो, संकल्प मज़बूत हो और सोच वैज्ञानिक हो, तो हवा के एक झोंके को चक्रवाती तूफ़ान बनते देर नहीं लगती। यदि आप एक ज़िन्दा इंसान की तरह जीने और हक़ के लिए लड़ने को तैयार हैं तो हमसे ज़रूर सम्पर्क कीजिये।
भगतसिंह का सपना, आज भी अधूरा, मेहनतकश और नौजवान उसे करेंगे पूरा
नौजवान भारत सभा, दिशा छात्र संगठन, स्त्री मुक्ति लीग
यूनीवर्सिटी कम्युनिटी फ़ॉर डेमोक्रेसी एण्ड इक्वॉलिटी (यूसीडीई)
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