जामिया मिलिया इस्लामिया के संघर्षरत छात्रों के समर्थन में और जामिया प्रशासन व पुलिस द्वारा बरपायी गयी बर्बरता के ख़िलाफ़ आगे आओ!

जामिया मिलिया इस्लामिया के संघर्षरत छात्रों के समर्थन में और जामिया प्रशासन व पुलिस द्वारा बरपायी गयी बर्बरता के ख़िलाफ़ आगे आओ!

जनवादी अधिकारों पर हमले नहीं सहेंगे!

 

13 फ़रवरी 2025 को भोर होने से पहले दिल्ली पुलिस जामिया मिलिया इस्लामिया के परिसर में प्रवेश करती है और प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ मारपीट कर उन्हें हिरासत में लेती है। छात्रों के साथ हिरासत में पुलिस द्वारा मारपीट की जाती है एवं उनके ठिकाने भी काफ़ी समय तक उजागर नहीं किये जाते।
हालिया प्रदर्शन का सिलसिला 16 दिसम्बर 2024 से शुरू हुआ, जब 15 दिसम्बर 2019 की भयावह रात को याद करने के मक़सद हेतु इकट्ठा हुए छात्रों को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा इकट्ठा होने से रोका गया। ज्ञात हो कि 15 दिसम्बर 2019 को फ़ासीवादी क़ानून सीएए-एनआरसी का विरोध कर रहे छात्रों पर पुलिस एवं अन्य राज्य शस्त्रबल द्वारा दमन किया था। लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्रों तक पर दमन पाटा चलाया गया था, जिसके कारण कई छात्र गम्भीर तौर पर घायल हो गये थे। अभी 16 दिसम्बर 2024 को जामिया प्रशासन के तमाम बाधाओं के बावजूद छात्र सफलतापूर्वक प्रदर्शन करते हैं।इसके बाद प्रदर्शन में शामिल 4 छात्रों को कारण बताओ नोटिस भेजा गया एवं उनपर एक अनुशासनात्मक कमेटी बैठायी गयी। अभाविप के सदस्य रहे कुलपति मज़हर आसिफ़ के इस तानाशाहपूर्ण रवैयै के ख़िलाफ़ प्रदर्शन रुकने के बजाय और तीव्र हो गया। इस प्रदर्शन का दमन करते हुए पुलिस ने 13 फ़रवरी 2025 को छात्रों के साथ मारपीट किया एवं उन्हें हिरासत में लेकर उन्हें प्रताड़ित भी किया। छात्राओं ने बताया कि 13 फ़रवरी की सुबह 5:30 बजे पुरुष पुलिसकर्मी द्वारा उन्हें डिटेन किया गया और उसके साथ बदसलूकी की गयी। इसके बाद जामिया प्रशासन द्वारा सत्रह छात्रों को निलम्बित किया गया। जामिया प्रशासन बेशर्मी यही तक नहीं रुकी , इन 17 लोग जिनमें छात्राएं भी हैं उनसे सम्बन्धित निजी जानकारी, उनके फोन नम्बर आदि नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दिया। जामिया प्रशासन की ओर से यह कदम छात्रों के विरोध करने के बुनियादी जनवादी अधिकार पर जोरदार हमला है। इसका विरोध देशभर में हो रहा है।
जामिया की घटना अनायास घटना नहीं है। देश में बढ़ रहे फ़ासीवादी दमन का प्रतिबिम्बन विश्वविद्यालय परिसरों में भी झलकता है जो वैज्ञानिक तर्कणा-प्रोत्साहन के केन्द्र होने के कारण फ़ासीवादियों के विशेष निशाने पर होते है। यह इस प्रकार की पहली घटना नहीं है। हालांकि नियमित आम छात्र हितों के दमन का सिलसिला जारी रहता है लेकिन फ़ासीवादी योजनाबद्ध तरीके से बड़ी दमनात्मक घटनाओं को अंज़ाम देते हैं ताकि छात्रों तथा आवाम में डर स्थापित किया जा सके। जामिया इसमें ‘अल्पसंख्यक’ संस्थान होने के कारण विशेष निशाने पर है। क्योंकि आरएसएस-भाजपा मुख्यतः मुसलमानों को (‘काल्पनिक’) शत्रु के तौर पर स्थापित करने में लगा है। जामिया पर निशाना साधकर इस परियोजना को बढ़ाने का मक़सद संघ परिवार का है जो मसले पर गोदी मीडिया के क़ुस्सा-प्रचार में भी झलकता है। जामिया पर हमला संघ भाजपा राजनीतिक प्रतिरोध का दमन (जामिया के छात्रों का इतिहास उत्पीड़न के ख़िलाफ़ संघर्ष का रहा है)और मुस्लिम ‘काल्पनिक’ शत्रु (जिसे संघ विश्वविद्यालय के ‘अल्पसंख्यक’ क्षेणी से पहचानता है) की छवि को स्थापित करने का है।
नौजवान भारत सभा जामिया मिलिया इस्लामिया के संघर्षरत छात्रों के साथ अपनी एकजुटता ज़ाहिर करता है एवं कुलपति मज़हर आसिफ़ के फ़ासीवादी रवैये, प्रशासन के तानाशाहानापूर्ण चरित्र और पुलिस द्वारा छात्रों के दमन की मुख़ालफत करता है। नौभास फ़ासीवादी दमन के ख़िलाफ़ प्रतिरोध करने एवं कैम्पस जनवाद के लिए जुझारू संघर्ष की प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित करता है। हम देश के सभी इन्साफ़पसन्द नौजवानों एवं नागरिकों को इस संघर्ष में शामिल होने का आह्वान करते हैं।

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