काकोरी काण्ड के महान शहीदों की शहादत दिवस के मौके पर हम यह संकल्प लें कि मुट्ठी भर शोषकों-शासकों के द्वारा फैलाये जा रहे साम्प्रदायिक उन्माद में हम नहीं बहेंगे! हम समान शिक्षा व सबको रोजगार जैसी बुनियादी अधिकारों की लड़ाई के लिए जाति-धर्म-क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठ कर लड़ेंगे। हम किसी चुनावी पार्टी के बहकावे में नहीं आयंगे। चुनाव बीतते ही उनके वायदे को पूरा करवाने व एक-एक पैसे का हिसाब लेने के लिए घेरेंगे। हमारे देश में इतना कुछ है कि अगर मुट्ठी भर लुटेरों के मुनाफे पर टिकी व्यवस्था की जगह समतामूलक व्यवस्था का निर्माण किया जाय तो हरेक इंसान को बेहतर जीवन दिया जा सकता है।
भगतसिंह के 110वें जन्मदिवस (28 सितम्बर) पर शहीदों के सपनों को पूरा करने के लिए उठ खड़े हो!
भगतसिंह और उनके साथियों से प्रेरणा लेते हुए हमें उठ खड़ा होना होगा। हम सभी इंसाफ़पसन्द नागरिकों, मेहनतकशों और छात्रें-नौजवानों की ओर अपना हाथ बढ़ा रहे हैं। देश में एक नयी शुरुआत हो चुकी है। भगतसिंह द्वारा बनाये ‘नौजवान भारत सभा’ को फिर से ज़िन्दा कर दिया गया है। देश के कई विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में हम इन्हीं आदर्शों पर क्रान्तिकारी छात्र संगठन बना रहे हैं। मेहनतकशों के बीच भी काम शुरू किया जा चुका है, स्त्रियों व जागरूक नागरिकों के मंच व संगठन जगह-जगह संगठित हो रहे हैं। इस विशाल देश को देखते हुए यह शुरुआत छोटी लग सकती है। लेकिन हर लम्बे सफ़र की शुरुआत एक उठाये गये पहले क़दम से ही होती है। दिशा यदि सही हो, संकल्प मज़बूत हो और सोच वैज्ञानिक हो, तो हवा के एक झोंके को चक्रवाती तूफ़ान बनते देर नहीं लगती। यदि आप एक ज़िन्दा इंसान की तरह जीने और हक़ के लिए लड़ने को तैयार हैं तो हमसे ज़रूर सम्पर्क कीजिये।
आम मेहनतकश आबादी के स्वास्थ्य का पंचनामा और मोदी-योगी की जुमलेबाजी का नंगा सच
आज सारी स्वास्थ्य प्रणाली ही बीमार है। भारतीय संविधान का भाग 3, अनुच्छेद 21 ‘जीने का अधिकार’ तो देता है पर जीने की पूर्वशर्त यानि अन्न, वस्त्र, मकान, स्वास्थ्य व शिक्षा की जवाबदेही से हाथ खीच लेता है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के नाम पर अब स्वास्थ्य सेवाओं का भी निजीकरण किया जा रहा है। नतीजतन स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होती जा रही हैं। एक तरफ 1 प्रतिशत अमीरों के पास भारत की 58 प्रतिशत संपत्ति इकट्ठी हो गयी है व अनाज के मामले में आत्मनिर्भर होने की बात की जा रही है वहीं दूसरी तरफ 5000 बच्चे हर दिन भूख व कुपोषण के कारण मर जाते हैं। मुनाफे की इस व्यवस्था यानि पूँजीवाद में हर चीज बाजार में बिकती है। इसके लिए मेहनतकश आम जनता की जान भी लेनी पड़े तो इस व्यवस्था को हर्ज नहीं है। गोरखपुर की घटना से ये एकदम स्पष्ट हो रहा है।
गौरक्षा के नाम पर मानव हत्याएं, जनसेवा के नाम पर अडानी-अम्बानी की सेवा – यही है फासीवादी संघी सरकार का असली चेहरा
पूरे देश में संघ परिवार (आरएसएस) से जुड़े संगठनों ने पिछले लम्बे समय से गौरक्षा दल खड़े किये हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य गाय के नाम पर भारत की जनता का साम्प्रदायिकीकरण करना है। इनके आतंक की वजह से बहुत सारी जगहों पर किसानों ने गाय खरीदना छोड़कर भैंस खरीदना शुरू कर दिया है क्योंकि ये घर के लिए दुधारू गाय ले जाते किसानों को भी पकड़कर मारते हैं। यहां तक कि मरे पशुओं का खाल उतारने वाले दलितों को भी मारते हैं। 2 अगस्त 2014 को दिल्ली में शंकर कुमार को इन्होंने जान से मार दिया था। शंकर कुमार दिल्ली महानगरपालिका की उस कॉण्ट्रेक्टर कम्पनी का कर्मचारी था जिसका काम मरे हुए पशु उठाना था।
महाविद्रोही राहुल सांकृत्यायन के जन्मदिवस (9 अप्रैल) व पुण्यतिथि (14 अप्रैल) पर
आज जब सर्वग्रासी संकट से ग्रस्त हमारा समाज गहरी निराशा, गतिरोध और जड़ता के अँधेरे गर्त में पड़ा हुआ है, जहाँ पुरातनपंथी मूल्यों-मान्यताओं और रूढ़ियों के कीड़े बिलबिला रहे हैं, तो राहुल सांकृत्यायन का उग्र रूढ़िभंजक, साहसिक और आवेगमय प्रयोगधर्मा व्यक्तित्व प्रेरणा का स्रोत बनकर सामने आता है। आज जिस नये क्रान्तिकारी पुनर्जागरण और प्रबोधन की ज़रूरत है, उसकी तैयारी करते हुए राहुल जैसे इतिहास-पुरुष का व्यक्तित्व हमारे मानस को सर्वाधिक आन्दोलित करता है।
जातिअंत का रास्ता सुधारवाद, संविधानवाद नहीं बल्कि क्रांतिकारी वर्गीय एकजुटता है
सभी जातियों के गरीबों को एकजुट होकर लड़ने की जरूरत है। निश्चित रूप से ये रास्ता आसान नहीं है। अगर आसान होता तो अब तक सभी जातियों के गरीब अपने आप ही एकजुट हो जाते और तब जाति व्यवस्था खत्म हो जाती। हजारों सालों से भारत में जाति व्यवस्था है और ऐसे में थोड़े से प्रचार से गरीब साथ नहीं आ जायेंगे पर ये भी सच है कि इसके अलावा ओर कोई रास्ता नहीं है।
शहीदों के जो ख़्वाब अधूरे, इसी सदी में होंगे पूरे!
भगतसिंह का सपना केवल अंग्रेजों को देश से भगाना नहीं था। बल्कि उनका सपना हज़ारों साल से चली आ रही अमीरी व गरीबी की व्यवस्था को इतिहास के कूड़ेदान में फेंककर समता और न्याय पर आधारित समाज बनाकर एक नये युग का सूत्रपात करना था। 1930 में ही भगतसिंह ने कहा था कि हम एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान व एक देश द्वारा दूसरे देश के शोषण के ख़िलाफ़ हैं। कांग्रेस व गाँधी के वर्ग-चरित्र और धनिकों व भूस्वामियों पर उनकी निर्भरता को देखते हुए भगतसिंह ने चेतावनी दी थी कि इनका मक़सद लूटने की ताक़त गोरों के हाथ से लेकर मुट्ठी भर भारतीय लुटेरों के हाथ में सौंपना है।
अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस–चुप रहना छोड़ दो! गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ दो!!
आज के दौर में भी स्त्रियों के सामाजिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। स्त्री-विरोधी अपराधों का ग्राफ़ लगातार बढ़ता ही जा रहा है। देश के किसी न किसी कोने से बलात्कार, एसिड हमले, दहेज के लिए हत्या और छेड़छाड़ के रूप में आये दिन भारतीय समाज की घृणित मर्दवादी मानसिकता की अभिव्यक्ति ख़बरों में आती रहती है। अभी हाल ही में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्रावास में रहने वाली छात्राओं के माँसाहार पर रोक लगाना, रात 8 बजे तक हॉस्टल में वापस आना और रात नौ बजे के बाद मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होने जैसे ऊल-जलूल नियम बनाये गये है। जबकि ऐसी कोई भी रोक छात्रों के लिए नहीं है। जब इन छात्राओं ने इसका विरोध किया तो इन्हें डराया-धमकाया जा रहा है।
सावित्रीबाई फुले की लड़ाई आगे बढ़ाओ, नई शिक्षाबन्दी के विरोध में नि:शुल्क शिक्षा के लिए एकजुट हों!
सावित्रीबाई ने पहले खुद सिखा व सामाजिक सवालों पर एक क्रांतिकारी अवस्थिति ली। ज्योतिबा की मृत्यु की बाद भी वो अंतिम सांस तक जनता की सेवा करती रहीं। उनकी मृत्यु प्लेगग्रस्त लोगों की सेवा करते हुए हुई। अपना सम्पूर्ण जीवन मेहनतकशों, दलितों व स्त्रियों के लिए कुर्बान कर देने वाली ऐसी जुझारू महिला को नौजवान भारत सभा की तरफ से हम क्रांतिकारी सलाम करते हैं व उनके सपनों को आगे ले जाने का संकल्प लेते हैं।
मनुस्मृति दहन की 89वीं वर्षगांठ पर – जाति उन्मूलन आन्दोलन को प्रतीकवाद, सुधारवाद और अर्जियां देने से आगे ले जाने का संकल्प लो!
आज हम जिस मुकाम पर खड़े हैं वहां केवल प्रतीकात्मक कदमों से काम नहीं चल सकता। आज दलितों के सम्मान के लिए भी सिर्फ अरजि़यां देने, मुकदमे लड़ने और सरकारों को ज्ञापन देने से ज्यादा कुछ नहीं होने वाला है और सड़कों पर उतरकर लड़ने की जरूरत है। क्या अदालतों में ग़रीब दलित आबादी के लिए न्याय है? क्या बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे के हत्यारों को सज़ा मिली? क्या दलित विरोधी उत्पीड़न में कानूनों, मुकदमों और अर्जियों से कोई कमी आयी है? क्या अस्मितावादी राजनीति करने वाले तथाकथित दलित चुनावी और गैर-चुनावी दल वोट बैंक और प्रतीकात्मक मुद्दों से आगे जाते हैं? नहीं।