एक महान क्रान्तिकारी की आख़ि‍री लड़ाई और उसकी याद के आईने में हमारा समय

कड़वी सच्चाई यही है कि जतिन दास, भगतसिंह और उनके तमाम साथी आज होते तो जेलों में होते, और जेल के भीतर वैसे ही लड़ रहे होते। फ़र्क़ बस इतना होता कि टीवी चैनलों और अख़बारों के दफ़्तरों में बैठे दल्ले उन्हें अपराधी, ख़ून के प्यासे और देशद्रोही साबित कर चुके होते। जैसे आज भी देश की जेलों में क़ैद हज़ारों नागरिकों के साथ किया जा रहा है, जिनका गुनाह सिर्फ़ यह है कि उन्होंने चन्द लुटेरों के हक़ में करोड़ों-करोड़ आम लोगों की लूट और बर्बादी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी है, करोड़ों-करोड़ लोगों को धर्म और जाति के आधार पर दोयम दर्जे के नागरिक बना देने की साज़िशों का विरोध किया है, और हर ज़ोरो-ज़ुल्म के सामने डटकर खड़े होते रहे हैं। जतिन दास की शहादत को आज याद करने का तभी कोई मतलब है जब आप इस “निज़ामे कोहना” के ख़िलाफ़ बोलने का हौसला रखते हों, वरना हर क्रान्तिकारी के शहादत दिवस पर ट्वीट करने वाले पाखण्डी नेताओं और हममें कोई फ़र्क़ नहीं रह जायेगा।

भगतसिंह से मज़हबी फ़िरकापरस्तों को ख़तरा क्यों है ?

सिमरनजीत मान जैसों की राजनीति का मूल एजेण्डा मज़हबी फिरकापरस्ती है। ये प्रमुख तौर पर सिख धर्म की पहचान की राजनीति के झण्डाबरदार हैं और खालिस्तान के समर्थक हैं। इनका बस यह कहना है कि खालिस्तान “कानूनी” तरीके से बनना चाहिए। भगतसिंह के बारे में सिमरनजीत मान का मुँह खोलना था कि हरियाणा में मज़हबी पहचान की प्रतिक्रियावादी राजनीति करने वाले मनोज दूहन जैसे लोग भी बल्लियों उछल पड़े और भगतसिंह के प्रति दुष्प्रचार में जुट गये। जिस तरह से पागलों को बीच-बीच में पागलपन के दौरे पड़ते हैं वैसे ही मज़हबी फ़िरकापरस्ती में विक्षिप्त दिमाग भी सुर्ख़ियों में बने रहने और अपने चेले-चपाटों के बीच सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए समय-समय पर अपने एजेण्डे के तहत ऐसी ओछी हरक़तें करते रहते हैं।

शहीद उधम सिंह अमर रहें !

उधम सिंह हिन्दू, मुस्लिम और सिख जनता की एकता के कड़े हिमायती थे इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘मोहम्मद सिंह आज़ाद’ रख लिया था। वे इसी नाम से पत्रव्यवहार किया करते थे और यही नाम उन्होंने अपने हाथ पर भी गुदवा लिया था। उन्होंने वसीयत की थी कि फाँसी के बाद उनकी अस्थियों को तीनों धर्मों के लोगों को सोंपा जाये। अंग्रजों ने इस जांबाज को 31 जुलाई 1940 को फाँसी पर लटका दिया। सन् 1974 में उधम सिंह की अस्थियों को भारत लाया गया और उनकी जैसी इच्छा थी उसी के अनुसार उन्हें हिन्दू, मुस्लिम और सिख समुदायों के प्रतिनिधियों को सौंप दिया गया। हिन्दुओं ने अस्थि विसर्जन हरिद्वार में किया, मुसलमानों ने फतेहगढ़ मस्ज़िद में अन्तिम क्रिया की और सिखों ने करन्त साहिब में अन्त्येष्टि क्रिया संपन्न की।

महान क्रान्तिकारी खुदीराम बाेस के जन्‍म दिवस 3 दिसम्‍बर के अवसर पर

आज ऐसे ही एक महान क्रान्तिकारी खुदीराम बोस का जन्‍म दिवस है। मात्र साढ़े 18 साल में खुदीराम बोस की शहादत ने ऐसी ही अमरता का सृजन किया। खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के मोहबनी गाँव में हुआ था। खुदीराम बोस का बचपन उस दौर में शुरु हुआ था जब अंग्रेज़ों की बेरहमी और फूट-डालो, राज करो’ की साज़िश ज़ोरों पर थी। वक़्त ने खुदीराम बोस को कम उम्र में ही बड़ा बना दिया था। खुदीराम बोस 1902 में ही यानि 13-14 वर्ष की छोटी सी उम्र में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ सक्रिय हो गये थे। सत्येन्द्रनाथ बसु की प्रेरणा से वो गुप्त क्रान्तिकारी संगठन के सदस्य बने।

“लव जिहाद” कुछ और नहीं बल्कि फ़ासीवादी गिरोह के पास दुष्प्रचार का हथियार है!

“लव जिहाद” के झूठ पर टिका कोई भी कानून न सिर्फ़ साम्प्रदायिक नफ़रत को बढ़ावा देने वाला होगा बल्कि यह सम्प्रदाय विशेष के ख़िलाफ़ दमन के एक हथियार के समान होगा। तथाकथित लव जिहाद के नाम पर बनने वाला यह कानून स्त्रियों के जीवन साथी चुनने की आज़ादी के ऊपर भी हमला होगा। यही नहीं इस तरह का कोई भी कानून देश के संविधान द्वारा प्रदत्त हमारे सीमित जनवादी हक़ों पर भी हमला होगा। संविधान में मौजूद सीमित जनवादी हक़ों की सुरक्षा करते हुए संविधान को अधिकाधिक जनवादी बनाये जाने की लड़ाई भी हमें जुझारू तरीके से लड़नी होगी। हम “लव जिहाद” के नाम पर बने किसी भी कानून का सख्त विरोध करते हैं।

जालियावालां बाग़ हत्याकाण्ड की बरसी पर!

आज़ादी के बाद अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी राज्यसत्ता की पूरी मशीनरी और बहुत सारे कानूनों को न केवल ज्यों का त्यों अपना लिया गया, बल्कि पिछले सात दशकों में रोलेट एक्ट से कहीं ज्यादा बर्बर और काले क़ानून जनता पर थोपे जा चुके हैं। आज एक तरफ़ पूरा देश कोरोना महामारी के भयंकर संकट से जूझ रहा है तो वहीं दूसरी तरफ़ देश के तमाम हिस्सों में ऐसे ही काले क़ानूनों के तहत तमाम जनपक्षधर बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूँसा जा रहा है। जालियावालां बाग़ की विरासत को याद करने और जालियावालां बाग़ के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का सही मतलब यही है कि जनता पर थोपे जा रहे हर तरह के बर्बर दमनकारी कानून का विरोध किया जाये और अपने बुनियादी अधिकारों के लिए आवाज़ बुलन्द की जाये।

लॉकडाउन के दौरान आम मुसीबतज़दा लोगों के लिए नौभास के राहत कार्य

लॉकडाउन के दौरान आम मुसीबतज़दा लोगों के लिए नौजवान भारत सभा के साथी देश में जहाँ-जहाँ राहत-कार्य चला रहे हैं, कई साथियों के सुझाव पर उनकी सूची हम एक जगह दे रहे हैं जिससे किसी भी रूप में इस मुहिम में सहयोग करने वाले साथियों को सुविधा होगी। नौजवान भारत सभा द्वारा चलाए जा रहे इन राहत कार्यो की रिपोर्ट हम लोग फेसबुक पेज पर नियमित रूप से अपडेट कर रहे हैं। आपसे आग्रह है कि हमारे फेसबुक पेज देखें और इन रिपोर्ट को फॉलो करें और अपने सुझाव भी दें

अय्यंकालि जयंती – महान अय्यंकालि की विरासत को याद करो! क्रान्तिकारी जाति-उन्‍मूलन आन्‍दोलन को आगे बढ़ाओ!

आपमें से शायद कुछ ने ही महान जाति-विरोधी योद्धा अय्यंकालि का नाम सुना हो। इसकी वजह समझी जा सकती है। अय्यंकालि उन जाति-विरोधी योद्धाओं में से थे, जिन्‍होंने ब्राह्मणवादियों और उनकी सत्‍ता से समानता का हक़ हासिल करने के लिए एक जुझारू लड़ाई लड़ी और कामयाब हुए। उन्‍होंने सरकार का इन्‍तज़ार नहीं किया जो बिरले ही ब्राह्मणवादियों और उच्‍च जाति के सामन्‍तों के विरुद्ध जाती थी, क्‍योंकि ये सामन्‍ती ब्राह्मणवादी शक्तियों तो शुरू से अन्‍त तक ब्रिटिश सत्‍ता के चाटुकार और समर्थक रहीं। अय्यंकालि ने सुधारों के लिए प्रार्थनाएं और अर्जियां नहीं दीं, बल्कि सड़क पर उतर कर ब्राह्मणवादियों की सत्‍ता को खुली चुनौती दी और उन्‍हें परास्‍त भी किया। अय्यंकालि ने सिद्ध किया कि दमित और उत्‍पीडि़त आबादी न सिर्फ लड़ सकती है, बल्कि जीत भी सकती है। अय्यंकालि का संघर्ष आज के जाति-उन्‍मूलन आन्‍दोलन के लिए बेहद प्रासंगिक है। आज अय्यंकालि के संघर्ष को याद करना जाति-उन्‍मूलन के आन्‍दोलन को सुधारवाद व व्‍यवहारवाद के गोल चक्‍कर से निकालने के लिए ज़रूरी है।

महान क्रान्तिकारी खुदीराम बाेस के शहादत दिवस 11 अगस्‍त पर…

आज ऐसे ही एक महान क्रान्तिकारी खुदीराम बोस का शहादत दिवस है। मात्र साढ़े 18 साल में खुदीराम बोस की शहादत ने ऐसी ही अमरता का सृजन किया। खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के मोहबनी गाँव में हुआ था। खुदीराम बोस का बचपन उस दौर में शुरु हुआ था जब अंग्रेज़ों की बेरहमी और फूट-डालो, राज करो’ की साज़िश ज़ोरों पर थी। वक़्त ने खुदीराम बोस को कम उम्र में ही बड़ा बना दिया था। खुदीराम बोस 1902 में ही यानि 13-14 वर्ष की छोटी सी उम्र में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ सक्रिय हो गये थे। सत्येन्द्रनाथ बसु की प्रेरणा से वो गुप्त क्रान्तिकारी संगठन के सदस्य बने।

शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद स्मृति अभियान – हमें तुम्‍हारा नाम लेना है एक अंधेरे दौर में

चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों का मकसद एक शोषणमुक्त, समतामूलक – धर्मनिरपेक्ष समाज का निर्माण करना था। जैसाकि चन्द्रशेखर आज़ाद के साथी भगवानदास माहौर ने लिखा था – “आज़ाद का जन्म हद दर्जे की ग़रीबी, अशिक्षा, अन्धविश्वास और धार्मिक कट्टरता में हुआ था, और फिर वे, पुस्तकों को पढ़कर नहीं, राजनीतिक संघर्ष और जीवन संघर्षमें अपने सक्रिय अनुभवों से सीखते हुए ही उस क्रान्तिकारी दल के नेता हुए जिसने अपना नाम रखा थाः ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ और जिसका लक्ष्य था भारत में धर्म निरपेक्ष, वर्ग-विहीन समाजवादी प्रजातंत्र की स्थापना करना। इसी हिन्दुस्तानी प्रजातंत्र सेना के प्रधान सेनानी “बलराज” के रूप में वे पुलिस से युद्ध करते हुए शहीद हुए। इस प्रकार ये सर्वथा उचित ही है कि चन्द्रशेखर आज़ाद का जीवन और उनका नाम साम्राज्यवादी उत्पीड़न में अशिक्षा, अन्ध-विश्वास, धार्मिक कट्टरता में पड़ी भारतीय जनता की क्रान्ति की चेतना का प्रतीक हो गया है”(यश की धरोहर – राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित)।